vaastu nirmaan ke jarie bhaagy mein badalaav

वास्तु निर्माण के जरिए भाग्य में बदलाव – वास्तु और प्राकृतिक उपाय – vaastu nirmaan ke jarie bhaagy mein badalaav – vastu aur prakritik upay

हमारी भारतीय हिन्दू संस्कृ्ति अपने आप में एक ऎसी विलक्षण संस्कृ्ति रही है,जिसका प्रत्येक सिद्धान्त ज्ञान-विज्ञान के किसी न किसी विषय से संबंधित हैं और जिसका एक मात्र उदेश्य मनुष्य जीवन का कल्याण करना ही रहा है.मनुष्य का सुगमता एवं शीघ्रता से कल्याण कैसे हो ? इसका जितना गम्भीर विचार भारतीय संस्कृ्ति में किया गया है. उतना अन्यत्र कहीं नहीं मिलता.जन्म से लेकर मृ्त्युपर्यंत मनुष्य जिन जिन वस्तुओं एवं व्यक्तियों के सम्पर्क में आता है, ओर जो जो क्रियाएं करता है,उन सभी को ऋषि-मुनि रूपी वैज्ञानिकों नें नितांत वैज्ञानिक ढंग से,सुनियोजित,मर्यादित एवं सुसंस्कृ्त किया है. ऎसी ही पूर्णत: विज्ञान सम्मत विद्या रही है—भारतीय वास्तु शास्त्र,जो कि भारत की अति प्राचीन विद्या है. विश्व के प्राचीनतम ग्रन्थ ऋग्वेद में भी इस विद्या का उल्लेख मिलता है.पिछले कुछ वर्षों से देखने में आ रहा है कि लोगों का ध्यान इस विद्या की ओर उन्मुख हुआ है
एक ज्योतिषी होने के नाते अक्सर लोगों द्वारा वास्तु विषयक जिज्ञासाओं/शंकाओं संबंधित विभिन्न प्रकार के प्रश्न पूछे जाते है. जिनमें अक्सर एक सवाल ये भी होता है कि वास्तु और भाग्य का जीवन में कितना संयोग है? क्या वास्तु के द्वारा भाग्य बदलना सम्भव है? इस प्रश्न के उत्तर में हमें सिर्फ यह समझना चाहिए कि भाग्य का निर्माण किसी वास्तु से नहीं, अपितु इन्सान के कर्मों से होता है. वास्तु शास्त्र के अनुसार भवन/मकान इत्यादि निर्मित करने पर कुवास्तुजनित कष्ट तो अवश्य दूर हो जाते हैं,परन्तु प्रारब्धजनित कष्ट तो इन्सान को हर स्थिति में भोगने ही पडते हैं.वास्तु का जीवन में उपयोग मात्र एक कर्म है और इस कर्म की सफलता का आधार वास्तुशास्त्रीय ज्ञान है,जो,एक विज्ञान के साथ-साथ एक धार्मिक विषय भी है. इसलिए वास्तु ज्ञान के साथ-साथ,वास्तु के पूजन और वास्तु के धार्मिक पहलुओं का भी हमें ज्ञान होना चाहिए.
सबसे पहले तो हमें ये जान लेना चाहिए कि किसी प्रकार की तोडफोड का नाम वास्तु नहीं है. वास्तु का अर्थ है ‘निवास करना'(वस निवासे) जिस भूमी पर मनुष्य निवास करते हैं, उसे ही वास्तु कहा जाता है. प्रकृ्ति द्वारा पाँच आधारभूत तत्वों—-भूमी,जल,अग्नि,वायु और आकाश से ही यह सम्पूर्ण ब्राह्मंड रचा गया है और ये पाँचों पदार्थ ही पंच महाभूत कहे जाते हैं. इन पंच तत्वों के प्रभावों को समझकर,उनका सामंजस्य बनाए रखे हुए,उनके अनुसार अपने भवन के आकार-प्रकार से,मनुष्य अपने जीवन को अधिक सुखी एवं सुविधासम्पन्न बना सकता है. दिशाओं के अनुसार भवनों की स्थिति और विन्यास का उसमें निवास करने वालों के जीवन पर सीधा एवं स्पष्ट प्रभाव पडता है.
सूर्य,चन्द्रादि अन्य ग्रहों तथा तारों आदि का पृ्थ्वी के वातावरण पर क्या प्रभाव पडता है ? अति प्राचीन काल में इसका पर्याप्त अध्ययन-मनन करने के उपरान्त ही अनुभव के आधार पर इस शास्त्र का जन्म हुआ है. सूर्य इस ब्राह्मंड की आत्मा है और उर्जा का मुख्य स्त्रोत. सूर्य और अन्य तारों से प्राप्त उष्मा और प्रकाश,समस्त आकाशीय पिंडों की परस्पर आकर्षण शक्ति,पृ्थ्वी पर उत्पन चुम्बकीय बल क्षेत्र और इस प्रकार के अन्य भौतिक कारकों का पृ्थ्वी की भौतिक दशा,वातावरण और जलवायु पर निश्चित प्रभाव पडता है. और इन सब का अनुकूल,या प्रतिकूल प्रभाव पडता है मानव जीवन पर. अत: वास्तु शास्त्र का ज्योतिष और खगोल से अति निकट सम्बंध है. मनुष्य के रहन-सहन को बहुत हद तक, ज्योतिष और खगोल संबंधी कारक प्रभावित करते हैं. अत: वास्तु शास्त्र के समस्त सिद्धान्त ज्योतिष विद्या पर आधारित हैं. किसी भी प्रकार का निर्माण कार्य करने से पूर्व इन सब सिद्धान्तों पर भली प्रकार से विचार कर लेना ही मनुष्य के लिए कल्याणकारी है.

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