Vish yog ke lakshan

Vish yog ke lakshan – विष योग क्या है और कब बनता है

विष योग क्या है?

Vish yog ke lakshan : कुंडली में शुभ और अशुभ योग बहुत महत्वपूर्ण हैं। यदि कुंडली में कुछ शुभ योग बन रहे हैं तो व्यक्ति को जीवन में सुख और समृद्धि प्राप्त होती है, लेकिन यदि कोई व्यक्ति अशुभ योग बन रहा है तो व्यक्ति के जीवन में कई परेशानियां और कठिनाइयां आएंगी। ज्योतिष कुंडली में शुभ और अशुभ योग का बहुत महत्व है। पुरुष का व्यवहार, कार्य और जीवन कुंडली के शुभ और अशुभ योगों से प्रभावित होता है।

यदि कुंडली में शुभ योग बनते हैं, तो व्यक्ति को अपने कार्यों में सफलता मिलती है, वहीं दूसरी ओर अशुभ योग होने के कारण उसे कई प्रकार के कष्टों का सामना करना पड़ता है। कुंडली में बनने वाले अशुभ योगों में से एक है ‘विष योग’। इसे पुनर्फू योग भी कहा जाता है।

Vish yog ke lakshan
Vish yog ke lakshan

विष योग कब बनता है?

यह तब बनता है जब शनि और चंद्रमा का संयोजन होता है। कुंडली में शुक्र योग शनि और चंद्रमा के कारण होता है। यह योग चंद्रमा की स्थिति में आरोही स्थिति में बनता है और जब शनि चंद्रमा के 3, 7 या 10 वें भाव से दिखाई देता है।

शनि पुष्य नक्षत्र

यदि शनि कर्क राशि में पुष्य नक्षत्र में है और चंद्रमा मकर या चंद्रमा में श्रवण नक्षत्र में है और शनि विपरीत स्थिति में हैं और दोनों अपने-अपने स्थान से एक-दूसरे को देख रहे हैं, तब भी विष योग की स्थिति निर्मित होती है।

यदि कुंडली में राहु आठवें स्थान पर मौजूद है और शनि (मेष, कर्क, सिंह, वृश्चिक) आरोही में है, तो यह विष योग बनता है।

विष योग के लक्षण – विष योग मे क्‍या समस्‍याएं आती हैं?

कुंडली में इस योग के कारण,

  • किसी व्यक्ति का दिल दुखी रहता है।
  • वह अपने परिवार के करीब होने पर भी अकेलापन महसूस करता है।
  • जीवन में सच्चे प्यार की कमी होती है।
  • माँ प्यार को पूरा करने में असमर्थ है या प्यार की कमी पड़ती है।
  • व्यक्ति गहरी निराशा में डूब जाता है, मन निराश रहता है।
  • माता सुख न होने के कारण व्यक्ति उदास रहता है।

यदि कुंडली में विष बनता है, तो व्यक्ति को मृत्यु, भय, दुःख, अभाव, बीमारी, गरीबी, आलस्य और कर्ज का सामना करना पड़ता है। इस योग से पीड़ित व्यक्ति के मन में नकारात्मक विचार आते रहते हैं और उसके कार्य बिगड़ने लगते हैं।

पूर्ण विष योग मे क्‍या समस्‍याएं आती हैं?

पूर्ण विष योग भी माता को प्रभावित करता है। शनि और चंद्रमा का संबंध किसी भी तरह से माता की आयु को कम कर देता है, अर्थात माता को पीड़ित या पीड़ित होना निश्चित है। यह योग मृत्यु, भय, दुःख, अपमान, गरीबी, दुःख, आलस्य और ऋण जैसे अशुभ योग का निर्माण करता है।

संपूर्ण चाणक्य निति
संपूर्ण चाणक्य निति

विष योग के उपाय क्या हैं?

विष योग के नकारात्मक प्रभावों को कम करने के लिए भगवान शिव की पूजा करें।

ऊँ नमः शिवाय”

मंत्र का नियमित रूप से सुबह-शाम कम से कम 108 बार करना लाभकारी होगा।

‘महा मृत्युंजय मंत्र’

का जाप करना भी लाभदायक होता है। संकटमोचन हनुमान जी की पूजा करें और शनिवार की शाम को, शनि देव के तेलभिषेकम से भी पीड़ा कम होती है। – Vish yog ke lakshan

FAQ :- विष योग के लक्षण के बारे मे कुछ सवाल जवाब

विष योग क्या है?

यदि कुंडली में शुभ योग बनते हैं, तो व्यक्ति को अपने कार्यों में सफलता मिलती है, वहीं दूसरी ओर अशुभ योग होने के कारण उसे कई प्रकार के कष्टों का सामना करना पड़ता है। कुंडली में बनने वाले अशुभ योगों में से एक है ‘विष योग’। इसे पुनर्फू योग भी कहा जाता है।

विष योग कब बनता है?

यह तब बनता है जब शनि और चंद्रमा का संयोजन होता है। कुंडली में शुक्र योग शनि और चंद्रमा के कारण होता है। यह योग चंद्रमा की स्थिति में आरोही स्थिति में बनता है और जब शनि चंद्रमा के 3, 7 या 10 वें भाव से दिखाई देता है।

विष योग के लक्षण क्या है?

यदि कुंडली में विष बनता है, तो व्यक्ति को मृत्यु, भय, दुःख, अभाव, बीमारी, गरीबी, आलस्य और कर्ज का सामना करना पड़ता है। इस योग से पीड़ित व्यक्ति के मन में नकारात्मक विचार आते रहते हैं और उसके कार्य बिगड़ने लगते हैं।

विष योग मे क्‍या समस्‍याएं आती हैं?

किसी व्यक्ति का दिल दुखी रहता है। वह अपने परिवार के करीब होने पर भी अकेलापन महसूस करता है। जीवन में सच्चे प्यार की कमी होती है। व्यक्ति गहरी निराशा में डूब जाता है, मन निराश रहता है। माता सुख न होने के कारण व्यक्ति उदास रहता है।

पूर्ण विष योग मे क्‍या समस्‍याएं आती हैं?

पूर्ण विष योग भी माता को प्रभावित करता है। शनि और चंद्रमा का संबंध किसी भी तरह से माता की आयु को कम कर देता है, अर्थात माता को पीड़ित या पीड़ित होना निश्चित है। यह योग मृत्यु, भय, दुःख, अपमान, गरीबी, दुःख, आलस्य और ऋण जैसे अशुभ योग का निर्माण करता है।

विष योग के उपाय क्या हैं?

विष योग के नकारात्मक प्रभावों को कम करने के लिए भगवान शिव की पूजा करें। “ऊँ नमः शिवाय” मंत्र का नियमित रूप से सुबह-शाम कम से कम 108 बार करना लाभकारी होगा।

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