वास्तु शास्त्र

vaastu shaastr dvaara grh klesh nivaaran

वास्तु शास्त्र द्वारा गृह क्लेश निवारण – वैदिक वास्तु शास्त्र – vaastu shaastr dvaara grh klesh nivaaran – vedic vastu shastra

आज के आधुनिक युग में भवन निर्माण का कार्य अत्यन्त कठिन हो गया है! साधारण मनुष्य जैसे तैसे गठजोड़ करके अपने लिए भवन की निर्माण करता है! तब भी यदि भवन वास्तु के अनुसार न हो तो मनुष्य दुखी, चिंतित एवं परेशान रहने लगता है! वास्तु शास्त्र वस्तुतः कला भी हैं और विज्ञान भी ! […]

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vaastu- kaise karen dishaon ka shodhan

वास्तु- कैसे करें दिशाओं का शोधन – वैदिक वास्तु शास्त्र – vaastu- kaise karen dishaon ka shodhan – vedic vastu shastra

दिशाओं में देवी-देवताओं और स्वामी ग्रहों के आधिपत्य से संबंधित बहुत चर्चाएं की गई हैं! दिशाओं के देव व स्वामी होने से पृथ्वी पर किसी भूखंड पर निर्माण कार्य प्रारंभ करते समय यह विचार अवश्य कर लेना होगा कि भूखंड के किस भाग में किस उद्देश्य से गृह निर्माण कराया जा रहा है! यदि उस

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vastu kala kya hai

वास्तुकला क्या है, जानिए प्रकार – वैदिक वास्तु शास्त्र – vastu kala kya hai, jaane prakar – vedic vastu shastra

वास्तु कला दो प्रकार की होती है- उत्तर भारतीय वास्तुशास्त्र एवं दक्षिण भारतीय वास्तुशास्त्र! वर्तमान में दोनों का मिश्रण चल रहा है! भारतीय वास्तुशास्त्र का आधार देवता एवं पंच तत्व यथा आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी है! भारतीय वास्तुशास्त्रानुसार भूमि खरीदने से पहले भूमि परीक्षण, भूमि पूजन, नींव पूजन, भवन पूरा होने पर गृह प्रवेश-पूजन

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vasudev ki visheshta

वास्तुदेव की विशेषताएँ – वैदिक वास्तु शास्त्र – vasudev ki visheshta – vedic vastu shastra

वास्तुदेव की तीन विशेषताएं होती हैं : – चर वास्तु : इसमें वास्तु पुरुष की नजर या रुख भाद्रपद ( अगस्त, सितम्बर ), आश्विन तथा कार्तिक ( अक्टूबर , नवम्बर ) महीनों के अवधि में दक्षिण की ओर होता है | तथा मार्गशीर्ष (नवम्बर-दिसंबर ), पौष ( दिसंबर – जनवरी ), और माघ (जनवरी-फरवरी )

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vaastu shaastr ke kuchh mahatvapoorn niyam

वास्तु शास्त्र के कुछ महत्वपूर्ण नियम – वैदिक वास्तु शास्त्र – vaastu shaastr ke kuchh mahatvapoorn niyam – vedic vastu shastra

वास्तुशास्त्र मानव जाति के लिए एक बहुमूल्य उपहार है १ एक अच्छे वास्तुकार का कार्य आधुनिक सुख सुविधा से पूर्ण एक ऐसे भवन के निर्माण में अपना सहयोग देना है जो उसमें रहने वाले को सुख-समृधि दे सके, भवन की सरंचना में किसी तरह की क्षति पहुंचाए बिना भवन की सकारात्मक ऊर्जा को बढाकर इसमें

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vaastu purush ke dosh

वास्तु पुरुष के दोष – वैदिक वास्तु शास्त्र – vaastu purush ke dosh – vedic vastu shastra

यह एक कठिन विद्या है, जिसमें भौतिक निर्माण कृत्य में कब कौन देवता क्रोधित हो जाए व क्या परिणाम देंगे, इनका ज्ञान आवश्यक है! कुछ सामानय गृह दोष व उनके परिणाम बताए जा रहे हैं, जो जनोपयोगी हैं! सामान्य जन इनका बिना किसी विशेषज्ञ की मदद से भी उपयोग कर सकते हैं! देवतागण यदि रुष्ट

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vastu mantr - 20 upay

वास्तु मंत्र – 20 उपाय, जीवन में खुशहाली लाए – वैदिक वास्तु शास्त्र – vastu mantr – 20 upay, jeevan mein khushahali lae – vedic vastu shastra

भवन निर्माण में दरवाजे और खिड़कियां सम संख्या में हों तथा सीढ़ियां विषम संख्या में हों! टॉयलेट ‍और किचन एक पंक्ति (कतार) में या आमने-सामने होना दोषकारक है! घर में गणेशजी की एक से अधिक मूर्ति हो तो कोई फर्क नहीं, परंतु पूजा एक ही गणेशजी की हो! घर में गणपति की मूर्ति, रंगोली, स्वस्तिक

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vaastu mantr apanaie

वास्तु मंत्र अपनाइए, सदा सुखी रहिए – वैदिक वास्तु शास्त्र – vaastu mantr apanaie, sada sukhee rahie – vedic vastu shastra

पूर्वी दिशा अग्नि तत्व का प्रतीक है! इसके अधिपति इंद्रदेव हैं! यह दिशा पुरुषों के शयन तथा अध्ययन आदि के लिए श्रेष्ठ है! 1. पश्चिमी दिशा वायु तत्व की प्रतीक है! इसके अधिपति देव वरूण हैं! यह दिशा पुरुषों के लिए बहुत ही अशुभ तथा अनिष्टकारी होती है! इस दिशा में पुरुषों को वास नहीं

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vaastu mein kabaadakhaane ka mahatv

वास्तु में कबाड़खाने का महत्व – वैदिक वास्तु शास्त्र – vaastu mein kabaadakhaane ka mahatv – vedic vastu shastra

वास्तु विज्ञान मनुष्य के चिरकालीन अनुभव का परिणाम है! यदि इसके सिद्धांतों का ठीक-ठीक पालन किया जाए तो निश्चित और तत्काल परिणाम मिलते हैं! विभिन्न वास्तु ग्रंथों में जीवन सुखी व समृद्ध बनाने के लिये घर के हर सदस्य को शयनकक्ष, भंडार, पूजा स्थल, भोजन कक्ष, मेहमान कक्ष, रसोई, शौचालय, नौकरों का कमरा, बैठक तथा

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vastu shastra

वास्तु शास्त्र – वैदिक वास्तु शास्त्र – vastu shastra – vedic vastu shastra

मुख्य दिशाये एवं मुख्य कोण पूर्व – सूर्योदय की दिशा – देवता : सूर्य उत्तर – पूर्वाभिमुखी होने पर बायीं ओर की दिशा – देवता : कुबेर पश्चिम – पूर्व के सामने की दिशा – देवता : वरुण दक्षिण – उत्तर के सामने की दिशा – देवता : यम ईशान कोण – पूर्व – उत्तर

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