राहू ग्यारहवे स्थान पर, केतु पाचवें स्थान पर और बाकी सभी गृह इन दोनों के मध्य फसे होने से कुंडली में विषधर कालसर्प दोष का निर्माण होता है ! विषधर कालसर्प दोष जातक के जीवन बहुत बुरा प्रभाव डालते है ! इस दोष के कारण जातक को आँख और हृदय रोग होते है, बड़े भाई बहनों से सम्बन्ध अच्छे नहीं चलते ! जातक की याददाश्त कमज़ोर होती है, `इसीलिए वह पढाई ठीक से नहीं कर पाते! जातक को हमेशा व्यवसाय में उचित लाभ नहीं मिलता, जातक अधिक पैसा लगाकर कम मुनाफा कमाता है ! इस योग के चलते जातक आर्थिक परेशानियाँ बनी रहती है ! प्रेम सम्बन्ध में धोखा मिलता है और विवाह के उपरान्त बच्चों के जन्म में समस्याएं आती है, जन्म के बाद बच्चों की सेहत भी खराब रहती है !
विषधर कालसर्प दोष से जिनकी कुण्डली प्रभावित होती है उनकी शिक्षा में बाधा आने की गुंजाईश रहती है। खासतौर, पर उच्च शिक्षा में यह दोष बाधक बनता है। इस दोष में राहु आय स्थान में होता है अत: धनार्जन हेतु काफी मेहनत करनी होती है। आय में उतार-चढ़ाव बना रहता है। इस दोष के प्रभाव से व्यक्ति कभी-कभी ऐसे कार्य कर बैठता है जिसके कारण मान-सम्मान एवं प्रतिष्ठा की हानि होती है। संतान सुख के लिए यह दोष कष्टकारी माना जाता है। संतान से अच्छे सम्बन्ध नहीं रहते अथवा संतान की प्राप्ति देर से होती है। बड़े भाई-बहनों से अनबन भी इस दोष का फल माना जाता है। इस दोष से प्रभावित स्त्री-पुरूष को नेत्र रोग, हृदय रोग, अनिद्रा एवं स्मरण शक्ति की कमी हो सकती है।
विषधर कालसर्प दोष की शांति के लिए कालसर्प यंत्र घर में स्थापित करके नियमित उसकी पूजा करनी चाहिए। भगवान भोले नाथ अपने कण्ठ में विष एवं गले में नाग की माला धारण करते हैं। जो व्यक्ति उनकी नियमित पूजा करता है उनके सभी प्रकार के सर्प दोष निष्प्रभावी हो जाते हैं। सावन मास को शिव भक्ति का मास कहा गया है। इस समय भगवान विष्णु शेषनाग की शैय्या पर शयन करते हैं। इसलिए सृष्टि की देख-रेख का जिम्मा भोलेनाथ पर होता है। इस मास में शिव की पूजा अधिक फलदायी मानी जाती है। सावन मास में शिव का अभिषेक करके कालसर्प शांति यज्ञ कराने से विषधर कालसर्प दोष के कष्ट से मुक्ति मिलती है। राहु मंत्र ओम ’रां राहवे नमः’ मंत्र का जप करके पंक्षियों को जौ एवं बाजरे के दाने खिलाने चाहिए, इससे भी कालसर्प दोष का अशुभ प्रभाव कम होता है।