वास्तुशास्त्र मानव जाति के लिए एक बहुमूल्य उपहार है १ एक अच्छे वास्तुकार का कार्य आधुनिक सुख सुविधा से पूर्ण एक ऐसे भवन के निर्माण में अपना सहयोग देना है जो उसमें रहने वाले को सुख-समृधि दे सके, भवन की सरंचना में किसी तरह की क्षति पहुंचाए बिना भवन की सकारात्मक ऊर्जा को बढाकर इसमें रहने वालों को सुख- समृधि, सम्पति, मन की शांति प्रदान कर सके १
वास्तुशास्त्र के कुछ मूल नियम हैं :
भूमि खरीदने से पहले वास्तु जानकार द्वारा वास्तु नियमों के अनुसार भूमि के आकर और प्रकार की जाँच करा लेनी चाहिए
मकान इस तरह से बनाया जाये कि उसमें प्राकृतिक प्रकाश, स्वच्छ हवा और सुबह के सूर्य की किरणें आ सकें
फैक्ट्री, वर्कशॉप, मिल या स्कूल का मुख्य द्वार कोने में नहीं होना चाहिए
दरवाजे के सामने किसी तरह का अवरोध नहीं होना चाहिए
दरवाजे के सामने ऊँचे वृक्ष नहीं लगाने चाहिए
रसोईघर, generator, transformer, या आग से सबंधित कोई वस्तु अग्निकोण में होनी चाहिए
पार्किंग की व्यवस्था उत्तर-पश्चिम कोने में होनी चाहिये
वर्षा का जल या संचित जल का प्रवाह उत्तर-पूर्व दिशा में होना चाहिए
पूजा करने वाले का चेहरा उत्तर -पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए
टॉयलेट, मेनहोल के गंदे पानी का निकास उत्तर-पश्चिम कोने में होना चाहिए
गृह निर्माण के बाद धार्मिक रीती से वास्तु पूजा, नवग्रह पूजा, ब्राह्मणों को भोजन तथा दक्षिणा आदि देकर प्रसन्न करना चाहिए
शास्त्रानुसार भवन निर्माण का दसवां भाग भवन जागरण के लिए धार्मिक अनुष्ठान पर खर्च किया जाना चाहिए